एक समे के बात हे, एक छोटे से गांव मा ‘चैतू’ नाम के एक गरीब किसान रहय। चैतू करा थोरकिन खेती-खारी रहय, जेमा ओहा मेहनत करके अपन परिवार के पेट पालत रहय। ओही गांव मा एक बड़ लालची साहूकार घलो रहय, जेकर नजर सबो के जमीन-जायदाद मा रहय।
​एक बार गांव मा अकाल परिस। चैतू करा खाय बर अन्न के दाना नहीं बाचिस। मजबूर होके ओहा साहूकार करा मदद मांगे बर गिस। साहूकार मन मा खुश होइस कि अब चैतू के जमीन ल हड़पे के मौका मिल गे। ओहा चैतू ल एक शर्त मा अनाज दिस—”अगले साल फसल होय मा, तें मोला आधा हिस्सा देबे, लेकिन शर्त ये हे कि आधा हिस्सा कोनो एक तरफ के होही—या तो जमीन के ऊपर के, या जमीन के नीचे के।”
​चैतू राजी हो गे। बोवाई के समे अइस, चैतू ह अपन दिमाग लगाइस अउ खेत मा आलू बो दिस। जब फसल कटई के समे अइस, साहूकार ह लालच मा आके कहिस—”मोला जमीन के ऊपर के हिस्सा चाही।”
​चैतू ह खुशी-खुशी राजी हो गे। साहूकार ल मिलीस आलू के ‘पत्ता अउ डारा’, जेकर कोनो मोल नहीं रहय। अउ चैतू ल मिलीस जमीन के नीचे के ‘आलू’, जेला बेच के ओहा मालामाल हो गे।
​साहूकार ल बड़ गुस्सा अइस। ओहा अगल साल फिर शर्त रखिस—”ये बार मोला जमीन के नीचे के हिस्सा चाही।”
​चैतू फेर मुस्कराइस अउ ये बार खेत मा धान बो दिस। जब फसल पकीस, त साहूकार ल मिलीस जमीन के नीचे के ‘जड़’, अउ चैतू ल मिलीस ऊपर के ‘धान के सुनहरी बाली’। साहूकार हाथ मलत रह गे अउ ओकर लालच ओला ले डुबीस। चैतू अपन चतुराई से अपन जमीन घलो बचा लीस अउ खुशहाल हो गे।